Monday, February 28, 2011
केवल सौ दिन को सिंघासन मेरे हाथों में दे दो ............... काला धन वापस न आये तो मुझको फांसी दे दो (कविता)
हरी ॐ पवार जी उन्होंने कविता पाठ किया था 1977 के जन आन्दोलन के समय और तब आपातकाल लागू हो गया था, और उन्होंने कहा इस बार पता नहीं क्या होगा, स्थिति कुछ कुछ वैसी ही है :-
मैं भी गीत सुना सकता हूँ , शबनम के अभिनन्दन के,
मैं भी ताज पहन सकता हूँ नंदन वन के चन्दन के
लेकिन जब तक पगडण्डी से संसद तक कोलाहल है
तब तक केवल गीत लिखूंगा जन गन मन के क्रंदन के ..........
जब पंछी के पंखो पर हो पहरे बम और गोली के
जब पिंजरे में कैद पड़े हो सुर कोयल की बोली के
जब धरती के दामन पर हो दाग लहू की होली के
कोई कैसे गीत सुना दे बिंदिया कुमकुम रोली के .......
मैं झोपड़ियों का चारण हूँ आंसू गाने आया हूँ
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ
अन्धकार में समां गए जो तूफानों के बीच जले
मंजिल उनको मिली कभी जो चार कदम भी नहीं चले
क्रांतिकथा में गौण पड़े है गुमनामी की बाहों में
गुंडे तस्कर तने खड़े है राजमहल की राहों में .........
यहाँ शहीदों की पावन गाथाओं को अपमान मिला
डाकू ने खादी पहनी तो संसद में सम्मान मिला
राजनीति में लोह पुरुष जैसा सरदार नहीं मिलता
लाल बहादुर जी जैसा कोई किरदार नहीं मिलता
ऐरे गैरे नत्थू खैरे तंत्री बनकर बैठे है
जिनको जेलों में होना था मंत्री बनकर बैठे है
लोकतंत्र का मंदिर भी बाज़ार बनाकर डाल दिया
कोई मछली बिकने का बाज़ार बना कर डाल दिया
अब जनता को संसद भी प्रपंच दिखाई देती है
नौटंकी करने वालों का मंच दिखाई देती है
पांचाली के चीर हरण पर जो चुप पाए जायेंगे
इतिहासों के पन्नो में वे सब कायर कहलाये जायेंगे
कहाँ बनेंगे मंदिर मस्जिद कहाँ बनेगी रजधानी
मंडल और कमंडल पी गए सबकी आँखों का पानी
प्यार सिखाने वाले बस ये मजहब के स्कूल गए
इस दुर्घटना में हम अपना देश बनाना भूल गए
कहीं बमों की गर्म हवा है और कहीं त्रिशूल जले
सांझ चिरैया सूली टंग गयी पंछी गाना भूल चले
आँख खुली तो पूरा भारत नाखूनों से त्रस्त मिला
जिसको जिम्मेदारी दी वो घर भरने में व्यस्त मिला
क्या यही सपना देखा था भगत सिंह की फ़ासी ने?
जागो राजघाट के गाँधी तुम्हे जगाने आया हूँ
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ
जो अच्छे सच्चे नेता है उन सबका अभिनन्दन है
उनको सौ सौ बार नमन है मन प्राणों से वंदन है
जो सच्चे मन से भारत माँ की सेवा कर सकते है
हम उनके कदमो में अपने प्राणों को भी धर सकते है
लेकिन जो कुर्सी के भूखे दौलत के दीवाने है
सात समुंदर पार तिजोरी में जिनके तहखाने है
जिनकी प्यास महासागर है भूख हिमालय पर्वत है
लालच पूरा नीलगगन है दो कौड़ी की इज्जत है
इनके कारण ही बनते है अपराधी भोले भाले
वीरप्पन पैदा करते है नेता और पुलिस वाले
केवल सौ दिन को सिंघासन मेरे हाथों में दे दो
काला धन वापस न आये तो मुझको फांसी दे दो
जब कोयल की डोली गिद्धों के घर में आ जाती है
तो बागला भगतो की टोली हंसों को खा जाती है
जब जब भी जयचंदो का अभिनन्दन होने लगता है
तब तब सापों के बंधन में चन्दन रोने लगता है
जब फूलों को तितली भी हत्यारी लगने लगती है
तो माँ की अर्थी बेटों को भारी लगने लगती है
जब जुगनू के घर सूरज के घोड़े सोने लगते है
तो केवल चुल्लू भर पानी सागर होने लगते है
सिंघो को म्याऊँ कह दे क्या ये ताकत बिल्ली में है
बिल्ली में क्या ताकत होती कायरता तो दिल्ली में है
कहते है कि सच बोलो तो प्रण गवाने पड़ते है
मैं भी सच्चाई को गाकर शीश कटाने आया हूँ
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ
कोई साधू सन्यासी पर तलवारे लटकाता है
काले धन की केवल चर्चा पर भी आँख चढ़ाता है
कोई हिमालय ताजमहल का सौदा करने लगता है
कोई यमुना गंगा अपने घर में भरने लगता है
कोई तिरंगे झंडे को फाड़े फूके आज़ादी है
कोई गाँधी को भी गाली देने का अपराधी है
कोई चाकू घोप रहा है संविधान के सीने में
कोई चुगली भेज रहा है मक्का और मदीने में
कोई ढाँचे का गिरना UNO में ले जाता है
कोई भारत माँ को डायन की गाली दे जाता है
कोई अपनी संस्कृति में आग लगाने लगता है
कोई बाबा रामदेव पर दाग लगाने लगता है
सौ गाली पूरी होते ही शिशुपाल कट जाते है
तुम भी गाली गिनते रहना जोड़ सिखाने आया हूँ
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ
(लेखक : हरी ॐ पवार)
अभी वतन आजाद नही, आजाद हिंद तू फ़ौज बना!!
श्रम करके संध्या को घर में, अपने बिस्तर पर आया था
उस दिन ना जाने क्यों मैंने, मन में भारीपन पाया था
जब आँख लगी तो सपने में लहराता तिरंगा देखा था
राष्ट्र ध्वजा की गोद लिए, भारत माँ का बेटा था
जयहिंद का नारा बोल बोल के आकर वह चिल्लाये थे
उस रात स्वंय बाबू सुभाष, मेरे सपने में आये थे
बोले भारत भूमि में जन्मा है, तू कलंक क्यों लजाता है
राग द्वेष की बातो पर, क्यों अपनी कलम चलाता है
इन बातो पर तू कविता लिख, मै विषय तुम्हे बतलाता हूँ
वर्तमान के भारत की मै,झांकी तुझे दिखाता हूँ
हमने पूनम के चंदा को राहू को निगलते देखा है
हमने शीतल सरिता के पानी को उबलते देखा है
गद्दारों की लाशों को चन्दन से जलते देखा है
भारत माता के लालों को शोलो पर चलते देखा है
देश भक्त की बाहों में सर्पों को पलते देखा है
हमने गिरगिट सा इंसानों को रंग बदलते देखा है
जो कई महीनो से नही जला हमने वो चूल्हा देखा है
हमने गरीब की बेटी को फाँसी पर झूला देखा है
हमने दहेज़ बिन ब्याही बहुओ को रोते देखा है
मजबूर पिता को गर्दन बल पटरी पर सोते देखा है
देश द्रोही गद्दारों के चहरे पर लाली देखी है
हमने रक्षा के सौदों में होती हुई दलाली देखी है
खादी के कपड़ो के भीतर हमने दिल काला देखा है
इन सब नमक हरामो का,शेयर घोटाला देखा है
हमने तंदूर में नारी को रोटी सा सिकते देखा है
लाल किले के पिछवाड़े, अबला को बिकते देखा है
राष्ट्रता की प्रतिमाओ पर,लगा मकड़ी का जाला देखा है
जनपद वाली बस्ती में हमने कांड हवाला देखा है
आतंकवाद के कदमों को इस हद तक बढ़ते देखा है
अमरनाथ में शिव भक्तों को हमने मरते देखा है
होटल ताज के द्वारे, उस घटना को घटते देखा है
माँ गंगा की महाआरती में, बम फटते देखा है
हमने अफजल की फाँसी में संसद को सोते देखा है
जो संसद पर बलिदान हुए, उनका घर रोते देखा है
उन सात पदों के सूरज को भारत में ढलते देखा है
नक्शलवाद की ज्वाला में, मैंने देश को जलते देखा है
आजादी के दिन दिल्ली,बन गई दुल्हनिया देखी है
15 अगस्त के दिन भोलू की भूखी मुनिया देखी है
हमने संसद के अन्दर राष्ट्र की भ्रस्टाचारी देखी है
हमने देश के साथ स्वयं, होती गद्दारी देखी है
ये सारी बाते सपने में नेता जी कहते जाते थे
उनकी आँखों से झर झर आंसू भी बहते जाते थे
बोले जा बेटे भारत माता के, अब तू सोते लाल जगा
अभी वतन आजाद नही, आजाद हिंद तू फ़ौज बना
Saturday, February 26, 2011
नेता इकम – नेता ......... नेता दूना – दोगला ........
नेता इकम – नेता
नेता दूना – दोगला
नेता तिया – तिकड़मबाज
नेता चौका- चार सौ बीस
नेता पंजे – पंचदलाल
नेता छक्का – छैल छबीला
नेता सत्ते – सत्ताधारी
नेता अट्ठे -अकड़बाज
नेता नम्मे – नमक हराम
नेता दसाम – भ्रष्टचार
अब इस पहाड़े का सार भी समझने की जरूरत है…।
नेता इकम – नेता…जी हां, नेता जी पर लाख तोहमतें लग जाएं, उनकी कुर्सी चली जाए लेकिन वह रहते तो नेता ही हैं. अब राजा जी को देखिए कि 14 दिन तिहाड़ जेल में बिताने पड़ेंगे लेकिन करेंगे तो फिर भी नेतागिरी ना।
नेता दूना- दोगला…नेताजी कब कहां, किसके पक्ष में क्या बोल जाएं, कहना मुश्किल है। यह प्राणी आज इस पार्टी में है तो कल किसी और पार्टी में जय जयकार करने लगते हैं। कुछ दिन अपनी पहली वाली पार्टी के खिलाफ खूब आग उगलते हैं, इसके बाद दोगले महाराज फिर उसी पार्टी में वापस आ जाते हैं। आखिर नेता हैं भई।
नेता तिया- तिकड़मबाज…अब नेताजी इस फन में इस कदर माहिर होते हैं कि अगर इनका वश चले तो पूरी दुनिया को मूर्ख बनाकर अपना काम निकाल लें। मामला चाहे इनके मतलब का हो या नहीं, लेकिन इनकी तिकड़मबाजी खूब ही चलती है।
नेता चोका- चार सौ बीस…मेरे ख्याल से इसमें तो कुछ कहने की जरूरत ही नहीं है। आखिर यह तो पैदाइशी गुण होता है नेता नाम के इस प्राणी में। वह जनता के साथ तो चार सौ बीसी करते ही हैं लेकिन मौका मिलने पर देश के साथ भी इस काम को करने से पीछे नहीं हटते।
नेता पंजे – पंचदलाल…देश में जितने भी दलाल होंगे उनका लीडर भी कोई न कोई नेता नाम का प्राणी ही होगा। यह प्राणी अपने सूत्रों का इस्तेमाल कर मंत्री तक भी बन सकता है। पैसा इनके लिए मायने नहीं रखता, यह पैसा लेकर संसद में सवाल भी पूछ बैठते हैं। यह गुण तो नेताजी में इस कदर होता है कि वह छोटे स्तर से लेकर टू जी स्पेक्ट्रम तक खूब ही दिखता है।
नेता छक्के – छैल छबीला…अरे, यह तो आप सभी को पता है कि यह प्राणी आजकल अगर एक बैठक में भी जाता है तो वहां बार गल्र्स को बुलाना अपनी शान समझता है। भई नेताजी को अपनी शान में गुस्ताखी बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं है।
नेता सत्ते – सत्ताधारी…सत्ता और नेता का तो जैसे जन्म-जन्मांतर का साथ होता है। आखिर कुछ भी करके नेताजी को सत्ता की हनक तो हमेशा सवार रहती है। सत्ताधारी हो या विपक्षी, नेता तो नेता होता है जी।
नेता अट्ठे -अकड़बाज…नेताजी का मिजाज भी काफी अकड़बाजी भरा होता है। जनता ने उनकी बात न मानी तो नेताजी की अकड़, गरीबों की बेटियों के अपहरण के दौरान विरोध हुआ तो नेताजी की अकड़ और बढ़ जाती है। इस प्राणी का यह सबसे बुरा दोष है जो आजकल अक्सर देखने को मिल जाता है।
नेता नम्मे – नमक हराम…इसे गुण कहें या दोष लेकिन आज के परिदृश्य में इसके बिना एक नेता को पूर्ण नहीं माना जाता। इनका एक शगल होता है कि जहां खाया, उसी थाली में छेद भी कर दिया, बस वोट और सत्ता चाहिए जनाब।
नेता दसाम – भ्रष्टचार…नेताजी और भ्रष्टाचार का तो वर्तमान में चोली-दामन का साथ है। इसके बिना नेताजी का स्विस बैंक का खाता सूना रहता है, इसलिए वह जब भी मौका मिलता है क्रिकेट से ज्यादा तेज चौका मारने में पीछे नहीं हटते।
भारत को भारत रहने दो घर अपना मत ढहने दो ॥
दोभारत को भारत रहने दो घर अपना मत ढहने दो ॥
निज पुरखों ने बलिदानों से जिसको जग-सिरमौर बनाया
भारत को ‘सोने की चिड़िया’ सारी दुनिया ने बतलाया
मानवता हित पूर्ण विश्व को हमने गीता-ज्ञान दिया
थाजो भी आया, हमने उसको भाई कहकर मान दिया था
आस्तीन के साँपों! तुमको हमने जी-भर दूध पिलायाज़हरीलो!
तुमने डस-डस कर भारत का क्या हाल बनाया
लेकिन अभी तो हमने तुमको अपना एक रुप दिखलाया
क्रोध आया तो शत्रु-सर्प फण हमने ऐड़ी तले दबाया
ज़िन्दा रहना चाहो तो, मत क्रोध में हमको दहने दोभारत
को भारत रहने दो घर अपना मत ढहने दो ॥
देव पाणिनि धन्य धन्य हैं जग को अक्षर ज्ञान कराया
शून्य खोज, भारत ने जग को प्रथम गणित का भान कराया
धन्वन्तरी ने सबसे पहले रोगों का उपचार किया था
संजीवन विद्या के द्वारा शव में भी सञ्चार किया था
राजनीति का ज्ञान न मिलता अर्थशास्त्र कब जग में आता
भरत भूमि का चणक पुत्र जो सारे जग को नहीं सिखाता
सुनें संस्कृति के दुश्मन अब और नहीं पाखण्ड चलेगा
निज पुरखों के दिव्य ज्ञान का भारत – भू पार दीप जलेगा
बांध स्वार्थ के और न बांधो प्रेम की सरिता बहने दो
भारत को भारत रहने दो घर अपना मत ढहने दो ॥
व्यवसायी बन आये गोरे कूटनीति का दांव चलाया
घर की फूट हमें ले डूबी भारत माँ को कैद कराया
त्याग, तपस्या, बलिदानों से गोरों का साम्राज्य हिला था
खण्डित थी पावन भारत-भू टूटा फूटा देश मिला था
अँग्रेजी ढर्रे पर ही जब हमने शासन-तंत्र बनाया
कुछ भूले-भटके बेटों ने अपने हाथों देश जलाया
वोट डाल निश्चिंत हुए हम बेफिक्री की नींद सो गए
भ्रष्ट हो गए शासक अपने नेता माला-माल हो गए
हमने न्यौता देकर खुद ही मल्टीनेशन को बुलवाया
खूब विदेशी चकाचौंध में अपनी आँखों को चुँधियाया
वस्तु, वास्तु, उद्योग कभी सब हमने ही जग को सिखलाया
क्युँ भूले अब निज गौरव हम क्यूँ निज संस्कृति को ठुकराया
आयातित चीज़ों का आखिर कब तक हम उपयोग करेंगे
और हमारे संसाधन का दोहन कब तक लोग करेंगे
अर्थ-तन्त्र है विवश हमारा जाल कर्ज़ का कसता जाता
‘सोने की चिड़िया’ भारत को नाग विदेशी डसता जाता
जला विदेशी माल की होली बयार स्वदेशी बहने दो
भारत को भारत रहने दो घर अपना मत ढहने दो ॥
ये कैसी आजादी – कैसा कानून ? क्या इसके लिए दिया था देशभक्तों ने खून ?
ये कैसी आजादी – कैसा कानून ?
बेरोजगारी,महँगाई से जनता है त्रस्त
ये कैसी आजादी – कैसा कानून ?
जागो सोने वालों जागो,
अपनी जिम्मेदारियों से मत भागो
ए खाक नशीनों उठ बैठो .............
दरबार ए वतन में जब एक दिन सब जाने वाले लायेंगे
कुछ अपनी सजा को पहुचेंगे कुछ अपनी जजा ले जायेंगे
ए खाक नशीनो उठ बैठो वो वक़्त करीब आ पंहुचा है
जब तख़्त गिराए जायेंगे जब ताज उछाले जायेंगे
अब टूट गिरेगी जंजीरे अब जन्दानों की खैर नहीं
जो दरिया झूम के उठे है तिनकों से ना टाले जायेंगे
कटते भी चलो बढ़ते भी चलो बाजु भी बहुत है सर भी बहुत
चलते भी चलो अब डेरे मंजिल पर ही डाले जायेंगे
ए जुल्म के मतों लैब खोलो चुप रहने वालों चुप कब तक
कुछ हर्श तो इनसे उठेगा कुछ दूर तो नाले जायेंगे
कुछ अपनी सजा को पहुचेंगे कुछ अपनी जजा ले जायेंगे
Monday, February 21, 2011
सिहासन खाली करो की जनता आती है.............(Poem)
सदियो की ठण्डी बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज् पहन इठलाती है।
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ...........
जनता? हां, मिट्टी की अबोध् मूर्ती वही,
जाड़े पाले की कसक सदा सहने वाली,
जब अंग-अंग मे लगे सांप हो चूस रहे,
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहने वाली।
लेकिन, होता भूडोल, बवंडर उठते है,
जनता जब कोपकुल हो भृकुटी चढ़ाती है,
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
हुन्कारो से महलो की नीव उखड जाती,
सांसो के बल से ताज हवा मे उडता है,
जनता की रोके राह समय मे ताब कहां?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुडता है।
सबसे विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
120 कोटि हित सिहासन तैयार करो,
अभिषेक आज राजा का नहीं, प्रजा का है,
120 कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।
आरती लिये तु किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरो, राजप्रासदो मे, तहखानो मे,
देवता कही सड़कों पर मिट्टी तोड रहे,
देवता मिलेंगे खेतो मे खलिहानो मे।
फ़ावडे और हल राजदण्ड बनने को है,
धुसरता सोने से श्रृंगार सजाती है,
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिहासन खाली करो कि जनता आती है।
( रामधारी सिंह 'दिनकर ')